आइये जानते है सिद्धपीठ पटजिरवा महारानी की गाथा

         “या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण सांसिस्था, नमस्तसय नमस्तसय नमस्तसय, नमो नमः “के मन्त्रोंच्चारण एवं जयघोष से पटजिरवा धाम गूंज उठा।

चैत्र नवरात्र के अवसर पर प्रकृति स्वरूपणि सिद्धपीठ पटजिरवा महारानी की महिमा बता रहे हैं

स्तम्भकार, लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार सुनील दुबे 

पश्चिम चम्पारण ही नहीं बल्कि भारत का अद्भुत एवं अद्वितीय स्थल हैं “सिद्धपीठ पटजिरवा धाम “जहाँ माँ भगवती नर एवं मादा रूप में प्रकृति स्वरूप में स्थित हैं l यह स्वरूप शायद ही कही मिल पाये l सिद्धपीठ पटजिरवा धाम में माँ भगवती नर एवं मादा पीपल के रूप में हजारों वर्ष से स्थित हैं l भगवती का प्रकृति रूप का वर्णन मार्कण्डेय पुराण सहित अन्य ग्रंथो में भी उल्लेखित हैं l सरल रूप से उपलब्ध दुर्गासप्तसति में भी इस स्वरूप का वर्णन हैं l माँ भगवती का स्वरूप यहां अद्वितीय हैं l दो पीपल पेड़, जिसमें दक्षिण दिशा में अवस्थित पीपल नर (स्त्री वर्ण )तथा उत्तर दिशा में स्थित पीपल मादा (पुरुष वर्ण ) हैं l दोनों ही पीपल के बीच दस महाविद्या का पिंड स्थित हैं, जो पटजिरवा महारानी के नाम से सुविख्यात हैं लिए

                  महारानी दरबार के ठीक सामने दो विशालकाय बरगद का पेड़ हैं l जिसे गौर से देखेंगे तो आप पाएंगे कि इन पेड़ों का स्वरूप दुर्गा भवानी का वाहन शेर की भाति हैं l लगता हैं कि जिस प्रकार भगवती प्रकृति रूप में खड़ी हैं ठीक उसी प्रकार उनके वाहन दो शेर भी प्रकृति रूप में गर्दन को उठाये बैठे हुए हैं l यह कहने की बात भर नहीं हैं, इस भाव को प्रत्यक्षतह आप देख सकते हैं l हाँ जरूरत इस बात की हाँ कि इसके लिए आपको गौर करना होगा l माँ पटजिरवा भवानी की कहानी एक बार नहीं सैकड़ों बार विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका हैl

              स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर के चैनलों में प्रदर्शित हो चुका हैl सर्वविदित हैं कि पटजिरवा महारानी की कहानी सती युग (सतयुग )से प्रारम्भ हुआ l भूतभावना भगवान शिव की पहली पत्नी प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थी l प्रजापति दक्ष ने एक बार अपने यहां बहुत बड़ा यज्ञ किया l भगवान शिव उनके दामाद थे, लेकिन उन्हें वे पसंद नहीं करते थे l इस कारण उस यज्ञ में न ही भगवान शिव को आमंत्रित किया और ना ही अपनी पुत्री सती को आमंत्रित कियाl इन दोनों को छोड़कर शेष सभी देवी देवता, ऋषि मुनि गंधर्व सबको आमंत्रित किया l आमंत्रण प्राप्त नहीं होने के बावजूद भी माता सती उस यज्ञ में अपने पति सहित शामिल होने के लिए आतुर थी l लेकिन भगवान शिव बगैर आमंत्रण यज्ञ में जाने से इनकार कर गएl पिता के यहां हो रहे यज्ञ में जाने के लिए सती माता ने जिद कर लिया और अकेले ही चली गई l यज्ञ में सती की उपस्थिति से प्रजापति को प्रसन्नता नहीं हुईl उन्होंने सती के समक्ष ही भगवान शिव को अपमानित शब्दों से संबोधित किया l जिसे सती माता बर्दाश्त नहीं कर सकी और हवन कुंड में शरीर को डालकर प्राण को त्याग दियाl इस घटना को भगवान शिव ने अपने दिव्य दृष्टि से देखा और तत्क्षण वहां प्रकट होकर यज्ञ का विध्वंस तो कर ही दिया साथ ही सती के शरीर को कंधे पर रखकर ब्रह्मांड का विनाश करने के संकल्प के साथ निकल पड़े l यह स्थिति देखकर उपस्थित देवगड़, ऋषि मुनि सहित सभी त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगे l ब्रह्मा जी सहित सभी देवी देवता भगवान विष्णु से अनुरोध करनेलगे कि भगवान शिव को रोकिये, अन्यथा ब्रह्मांड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगाl विष्णु जी ने कहा कि इस समय उन्हें रोक पाना संभव नहीं हैl सबो ने उनसे अनुरोध किया कि कोई ना कोई युक्ति निकालिएl भगवान विष्णु ने अपने चक्र सुदर्शन का आवाहन किया और उनसे कहा कि, भगवान शिव के कंधे से सती माता के शरीर को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित कर गिरा दो, चक्र सुदर्शन ने वही किया l ऐसा माना जाता है कि माता सती के एक्यावन टुकड़े हुए जिसमें से बहुत से भाग धरती, समुद्र एवं आकाशदीप में गिरे l धरती पर गिरे हुए भाग जो चिन्हित हुए वे सिद्ध पीठ के रूप में ख्यातिलब्ध हुए l उसी क्रम में माता सती का दोनों पैर भाग यहां गिरा l पैर भाग गिरने के कारण इस स्थान का नाम कलांतर में पदगिरा पड़ा l जहाँ पैर भाग गिरा वहां दोनों पैरों के स्थान पर दो पीपल के पेड़ अंकुरित होकर निकले, जिनका स्वरूप एक नर पीपल तो दूसरे का मादा पीपल के रूप में बाद में परिलक्षित हुआ l मना जाता हैं कि नर पीपल महाशिवानी तो दूसरा मादा पीपल महाशिवा के प्रकृति रूप में उपस्थित हुए l यह पीपल आज भी विद्यमान हैं l अब प्रश्न उठता हैं कि कैसे स्पष्ट होगा कि एक नर तो दुसरा मादा पीपल हैं l आप जब भी पटजिरवा महारानी का दर्शन करने जाय तो गौर करेंगे कि, दक्षिण दिशा में स्थित पीपल के पेड़ में छोटे छोटे पतें उपर से लेकर निचे तक लगे हुए हैं l निचे के भाग में लगे पते घुघरु जैसे लगे हैं l वही उत्तर दिशा में स्थित पेड़ सपाट,जैसे पहलवानी जंघा हो,जैसा हैं l जिसमें पतों की संख्या कम हैं l पते का आकर भी बड़ा बड़ा हैं lपेड़ का प्रदर्शित स्वरूप रुखा रुखा एवं भभूति लगा हो जैसे हैं l जिस प्रकार श्मशानी शिव का रूप भभूति लपेटे शरीर का होता हैं l इस पीपल की एक खाशियत यह भी हैं कि यह लगातार सनेहे सनेहे बढ़ता हैं l जब इसका उचाई महाशिवानी पीपल पेड़ से बड़ा होजाता हैं तो यह बिना आंधी बेयार के खंडित होकर गिर जाता हैं और महाशिवानी पीपल के बराबर में हो जाता हैं l दोनों पीपल की खासियत यह हैं कि जब दक्षिण दिशा से आप उन पेड़ों को देखेंगे तो उत्तर दिशा का मादा पेड़ यानि महाशिव रूपी पीपल पेड़ बड़ा नजर आयेगा l वही उत्तर की दिशा से देखेंगे तो दक्षिण दिशा का महाशिवानी रूपी पीपल पेड़ बड़ा नजर आएगा l जबकि सामने से देखेंगे तो दोनों ही पेड़ एक बराबर में नजर आएंगे l प्रकृति का यह अनोखा दृश्य कुछ दुरी से देखने पर ही प्राप्त होगा l समीप से स्पष्ट नहीं होगा l प्रकृति स्वरूपणि पटजिरवा महारानी का इसीलिए तो सिद्ध मंत्र हैं :-या देवी सर्वभूतेषु प्रकृतिरूपेण सांसिस्था, नमस्तसय नमस्तस्य नमस्तस्य, नमो नमः l यह मंत्र काफी प्रभावकारी हैं l इस मंत्र का नियमित जाप करने वालों को कठिनाई के दिनों में माँ भगवती अपने भक्त का मदद करने के लिए आतुर हो जाती हैं l समस्या ग्रस्त व्यक्ति को समस्या से मुक्ति प्रदान करती हैं l इस मंत्र को जानने वाले मंत्र उच्चारण कर माँ भगवती का जय घोष करते हैं l नवरात्र काल में अस्टमी एवं नवमी को अधिकांश लोग उनके सिद्ध मंत्र से जयघोष करतेहैं, जिससे पटजिरवा धाम गूंजयमान हो उठता हैं l पटजिरवा महारानी काफी कृपालु एवं दयालु हैं l अपने भक्तों, श्रधांलुओं के मनोकामनावओ को पुरा करने वाली हैं l उनके दरबार में माथा टेक कर आने वाले को कुछ न कुछ मिल ही जाता हैं l कभी कोई विपरित परिस्थिति आ जाय तो उनका स्मरण करके तो देखिए, कुछ न कुछ राहत मिल ही जायेगी l अगर आप उनके दरबारी हो गये तो जीवन के अगले क्रम में निरंतर आगे बढ़ते ही रहेंगे l अपने भक्तों पर सदा सहाय रहने वाली माता हैं l तभी तो उनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही हैं l न वरात्रि के अष्टमी एवं नवमी तिथि को अनुमानतः एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु माता का दर्शन करते हैं l इनके चरणों में माथा टेकने के लिए देश के विभिन्न विभिन्न प्रांतो से श्रद्धालु आते हैं l नेपाल देश से तो श्रधांलुओं का आना जाना सालों भर लगा रहता l पटजिरवा महारानी की कहानी भगवान राम और माता सीता से भी जुडा हुआ हैं l दोनों पेड़ों के मध्य स्थापित दसमहाविधा का पिंड भगवान राम एवं माता सीता के करकमलों से ही स्थापित किया हुआ हैं l इस स्थान की ख्याति दूर दूर तक फैली हुयी हैं l पटजिरवा महारानी का प्रांगण कोई ज्यादा बड़ा नहीं हैं, लेकिन जब आप वहां जायेंगे तो प्रांगण अंतर्गत की प्रकृति भवानी की मनोरम छटावों को देखकर आपका मन अपने आप प्रफुल्लित हो जायेगा l

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