चम्पारण में भी खनिज संसाधनों का व्यापक सर्वे होना चाहिए?

        एक तरफ बिहार के कई जिलों में पत्थर खनन की संभावनाएं तलाशने की तैयारी है वहीं दूसरी तरफ चम्पारण के हजारों युवा आज भी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं। सवाल सीधा है अगर खनन रोजगार का जरिया बन सकता है, तो चम्पारण को इस दौड़ से बाहर क्यों रखा गया है ?

बिहार में पत्थर खनन को लेकर एक बार फिर बड़ी तैयारी शुरू होती दिख रही है। गया और शेखपुरा के बाद अब बांका, औरंगाबाद, नवादा, कैमूर और रोहतास जैसे जिलों में पत्थर खनन की संभावनाओं पर काम किए जाने की बात सामने आ रही है।
लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है की जब बिहार के इन जिलों को खनन की संभावनाओं में शामिल किया जा रहा है, तो चम्पारण को आखिर क्यों नहीं?
दरअसल, पत्थर खनन केवल खनिज निकालने का मामला नहीं है। अगर इसे वैज्ञानिक तरीके से, पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए और स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ शुरू किया जाए, तो यह स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए रोजगार का एक बड़ा माध्यम बन सकता है।
खनन के साथ मजदूरों के अलावा ट्रांसपोर्ट, मशीनरी, मरम्मत, निर्माण सामग्री, छोटे कारोबार और दूसरी कई गतिविधियों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसका एक सीधा फायदा यह भी हो सकता है कि रोजगार के लिए दूसरे राज्यों और बड़े शहरों की ओर होने वाला पलायन कम हो।
अब सवाल चम्पारण को लेकर है।

पश्चिम और पूर्वी चम्पारण में बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और रोजगार के सीमित अवसरों के कारण यहां से बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या चम्पारण में पत्थर या अन्य खनिज संसाधनों की संभावनाओं का वैज्ञानिक सर्वे कराया गया है? अगर संभावनाएं हैं, तो चम्पारण को भी खनन की योजनाओं में शामिल करने पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा?
हालांकि यह भी जरूरी है कि रोजगार के नाम पर पर्यावरण और स्थानीय लोगों के हितों से समझौता न हो। जहां भी खनन हो, वहां पर्यावरणीय प्रभाव, जंगल, जलस्रोत, खेती और स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले असर का आकलन जरूरी है।
कुल मिलाकर सवाल सिर्फ पत्थर खनन का नहीं है। अगर खनिज संसाधन रोजगार और विकास का माध्यम बन सकते हैं, तो चम्पारण को भी इस संभावना का मौका क्यों नहीं?
क्या चम्पारण में भी खनिज संसाधनों का व्यापक सर्वे होना चाहिए?

          आखिर जनप्रतिनिधि इस संभावना पर विचार क्यों नहीं करते हैं जिससे जिले की आमदनी और पलायन दोनों मुद्दों को एक साथ निपटा जा सके।

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