राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों विदेश दौरे पर हैं और उनके ब्रिटेन दौरे को लेकर लंदन में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
RSS के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मोहन भागवत अमेरिका और कनाडा के बाद ब्रिटेन पहुंचे। लेकिन लंदन पहुंचते ही उनके दौरे का विरोध भी शुरू हो गया। करीब 20 नागरिक अधिकार संगठनों ने लंदन के मेयर सादिक खान और ब्रिटिश प्रशासन को पत्र लिखकर RSS से जुड़े कार्यक्रमों का बहिष्कार करने की मांग की। इन संगठनों ने RSS की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों को लेकर गंभीर आरोप लगाए।
उसके बाद विवाद यहीं नहीं रुका
6 सितंबर को मोहन भागवत लंदन के खालसा जथा ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारे पहुंचे। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब के सामने माथा टेका, अरदास की, रुमाला साहिब भेंट किया और कड़ाह प्रसाद ग्रहण किया। उनके साथ राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी भी मौजूद थे।
भागवत के गुरुद्वारा पहुंचने पर सिख समुदाय के कुछ संगठनों ने आपत्ति जताई। उनका सवाल था कि RSS की विचारधारा को लेकर विवादों के बीच भागवत को गुरुद्वारे में आमंत्रित क्यों किया गया?
वहीं गुरुद्वारा प्रबंधन ने इस आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि गुरुद्वारा सभी के लिए खुला है। किसी व्यक्ति का स्वागत करने का मतलब उसकी विचारधारा का समर्थन करना नहीं है।
विक्रमजीत सिंह साहनी ने भी भागवत के दौरे का बचाव किया। उन्होंने कहा कि भागवत वहां एक श्रद्धालु के रूप में पहुंचे थे।
इसी बीच लंदन के Parliament Square में भी मोहन भागवत के ब्रिटेन दौरे के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। सोशल मीडिया और विभिन्न रिपोर्टों में प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है।
बड़ा सवाल
अब सवाल यह है कि क्या यह केवल एक राजनीतिक विरोध है या RSS और सिख संगठनों के बीच पुराने वैचारिक मतभेद फिर से सामने आ गए हैं? दूसरी तरफ मोहन भागवत ने लंदन में अपने संबोधन में RSS की विचारधारा को लेकर उठने वाली आलोचनाओं का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि संघ का मूल आधार नफरत नहीं बल्कि निस्वार्थ प्रेम, सेवा और सामाजिक एकता है।
अब देखना होगा कि यह विवाद आगे कितना बढ़ता है और क्या RSS और सिख संगठनों के बीच संवाद का कोई रास्ता निकलता है।






